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कॉमनवेल्थ गेम्स में हरियाणा के दीपक पुनिया ने पाकिस्तानी रेसलर को हराया, जीता गोल्ड

 कॉमनवेल्थ गेम्स 22th: इंग्लैंड के बर्मिंघम में हो रहे 22वें कॉमनवेल्थ गेम्स में भारतीय खिलाड़ियों ने अपने हिम्मत और जोर का बहुत ही शानदार प्रदर्शन दिया। भारतीय खिलाड़ियों के बेहतरीन प्रदर्शन के बाद अब अपने पहलवानों ने गेम्स में अपने जज्बे का डंका बजा दिया है। भारत के पहलवानों ने एक ही दिन में 3 गोल्ड समेत 6 मेडल अपने खाते में (Deepak Punia win gold in CWG) जमा करवा लिए हैं, जिसमें मुख्य भूमिका रही है गोल्डन बॉय दीपक पुनिया ‘केतली पहलवान-Ketli Pehalwab’ की, दीपक पुनिया अपने शानदार प्रदर्शन से देश की असल ताकत की मिसाल पेश कर दी है।


दीपक पूनिया (Deepak Punia) ने अपने गांव ही नहीं बल्कि पूरे देश का सर फक्र से ऊपर किया है दीपक पुनिया अपने गांव में केतली पहलवान के नाम से प्रसिद्ध है, ऐसा क्यों है इसके पीछे भी एक रोमांचक कहानी है। बात पिछले शुक्रवार यानी 5 अगस्त की है जब दीपक पूनिया ने भारत को गोल्ड मेडल दिलाया है। दीपक पुनिया ने फाइनल में पाकिस्तान के रेसलर को हराकर गोल्ड मेडल जीता है। दीपक पूनिया ने 86 किलोग्राम फ्री स्टाइल कुश्ती में अपना बेहतरीन टेक्निक के साथ अपना दमखम दिखाते हुए पाकिस्तान के मोहम्मद इमान को 3-0 से हरा दिया। इस पूरे मैच के दौरान पाकिस्तानी रेसलर एक बार भी दीपक पुनिया पर हावी नहीं हो पाए।


दीपक पुनिया हरियाणा  (Hariyana) के झज्जर (Jhajhar) जिले के है। दीपक पुनिया को जन्मे से ही  पहलवानी विरासत में मिली है। उनके पिता जी  और दादा जी भी पहलवानी किया करते थे। जब दीपक ने महज 4 साल थे तभी ही उन्होंने पहलवानी में एंट्री कर दी थी। दीपक ने जब पहली बार दंगल जीता था तो उन्हें इनाम में सिर्फ 5 रुपए मिले थे।

दीपक पुनिया का  यह सफर बहुत मुश्किलो के साथ संघर्षों से भरा हुआ रहा है। उनके पिता जी पहलवानी के साथ दूध बेचने का काम भी करते हैं, दीपक पूनिया के परिवार की  आर्थिक स्थिति ज्यादा  अच्छी नहीं थी। जिस वजह से दीपक ने बेहद कम उम्र में अपने चचेरे भाई सुनील कुमार के साथ दंगल में भाग लेना शुरू कर दिया ताकि वह भी अपने परिवार को को सपोर्ट दे सके। जब उनके भाई सुनिल ने दीपक की प्रतिभा देखी तो साल 2015 में उन्होने अपने भाई दीपक को दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में भेज दिया।


 छत्रसाल जाकर दीपक को सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त जैसे बड़े दिग्गज पहलवानों  का मार्गदर्शन मिला। वो सुशील कुमार ही थे जिन्होंने दीपक को सेना में भर्ती न होने की बजाय अपने खेल पर ध्यान की सलाह दी थी। छत्रसाल मैं ही दीपक को केतली पहलवान भी बुलाया जाना लगा, इसकी वजह थी- कि दीपक बेहद दुबले पतले पहलवान थे, और उनकी कुश्ती की टेक्निक्स और साथ में ही शरीर में गजब की फुर्ती कमाल की है।





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